Friday, November 20, 2009

तुम क्या गए... जिंदगी को बहाना मिल गया बिगड़ने का.

दिल से निकली इस आवाज़ को ज़रा सुनिए....

तुम क्या गए...
जिंदगी को बहाना मिल गया बिगड़ने का।
कितनी तरतीब से रखा था,
सहेजा था तुमने मुझे।
जिंदगी फूल थी पहले तुम्हारे गजरे का।
जिंदगी फूल तो अब भी है,
पर एक गुलाब है सुखा हुआ।
पड़ी हुई है जो दबी यादों के पन्नो के बीच....
सूखी हुई, मुरझाई हुई।

तुम जो आ जाओ तो फिर खिल जाए....
बिगड़ गई है... कुछ सुधर जाए।

2 comments:

zindagi yuhi chalte rahe said...

kaash jo chala gaya wo wapas aa jaata aur ye murjhaye hue phool bhi phir se khil pate.. aur ye zindagi bhi phir se khusnuma ho pati.

Shakeb Ahmad said...

Tumhe bigadne k liye bahaanon ki zarurat kyunkar hone lagi.......