Tuesday, November 24, 2009

रात मुझे घोल कर न पी जाए.

रात के सन्नाटे में इस निशाचर जीव ने फिर कुछ लिखा....

कितने गुस्से में लग रही है रात
जैसे खुन्नस में खड़ा हो कोई दुश्मन मेरा।
उड़ेल देगी जैसे पूरी ही कालिख मुझमे.
और चिल्ला के मेरे कानो में कर देगी ज़खम।
ऐसे घुस जाएगी मेरे जिस्म में कीलों की तरह, यूँ लगता है
के फिर से एक उमर लगेगी ठीक होने में।
अजब सा डर है घुला जाता है दिल में मेरे.....
ये रात घोल कर कही न मुझको पी जाए।
ये रात चूस कर न थूक दे कही मुझको॥

2 comments:

zindagi yuhi chalte rahe said...

raat ne jo jism pe zakhma diye hai wo to kuch samay mein bhar jayenge, un zakhmo ka kya jo umar bhar nahi bharenge.. kaash ye raat ghol ke hi pe jate..

Shakeb Ahmad said...

Har raat k baad subah hoti hai beta..............
jhel lo
ye raat bhi guzar he jaayegi............
bhale hi ye raaat sardiyon kiraat ki tarah kuchh zyada he lambi kyu na ho..
par iski bhi subah hogi hi......