Wednesday, November 18, 2009

मेरी हाइवे की यात्रा

अर्ज़ किया है...

कितनी फुर्ती से ख़तम होती हैं दूरियां,
जब सफर हाइवे का होता है।
ज़रा सी देर में दस बीस किलोमीटर तो
यूँ ख़तम होते हैं जैसे के हों टूटे पैसे।
और शहरों की भीडभाड़ में यूँ लगता है,
जैसे नुक्कड़ के पान वाले को दे दी हो एक हज़ार की नोट।
मेरी गाड़ी के पहिये ऐसे खीचते हैं सड़क,
जैसे स्ट्रा से कोई ड्रिंक खीच लेता है।

शाम का वक्त हो रफ़्तार और तन्हाई...
या खुदा क्या कमाल होता है....
ऐसे आलम मैं जब सफर हाइवे का होता है।

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