दोस्तों इस नज़्म के बारे में कुछ नही कहूँगा। ये क्या कहना चाहती है ख़ुद समझिये। न समझ ए तो मुझसे पूछियेगा अपने ई- mail एड्रेस या फ़ोन नम्बर के साथ।
वो एक फ़ोन नम्बर मेरे ज़हन में दुबका है कहीं।
डिलीट कर दिया है कबका अपने सेलफोन से।
ज़रा खदेड़ो लाठी डंडों से इसको,
वरना ट्यूमर सा फट पड़ेगा कभी।
ये मुझे अक्सर ही दर्द देता है रह रहकर।
जब कभी माज़ी की नब्जों में ये फस जाता है।
Friday, November 27, 2009
Tuesday, November 24, 2009
रात मुझे घोल कर न पी जाए.
रात के सन्नाटे में इस निशाचर जीव ने फिर कुछ लिखा....
कितने गुस्से में लग रही है रात
जैसे खुन्नस में खड़ा हो कोई दुश्मन मेरा।
उड़ेल देगी जैसे पूरी ही कालिख मुझमे.
और चिल्ला के मेरे कानो में कर देगी ज़खम।
ऐसे घुस जाएगी मेरे जिस्म में कीलों की तरह, यूँ लगता है
के फिर से एक उमर लगेगी ठीक होने में।
अजब सा डर है घुला जाता है दिल में मेरे.....
ये रात घोल कर कही न मुझको पी जाए।
ये रात चूस कर न थूक दे कही मुझको॥
कितने गुस्से में लग रही है रात
जैसे खुन्नस में खड़ा हो कोई दुश्मन मेरा।
उड़ेल देगी जैसे पूरी ही कालिख मुझमे.
और चिल्ला के मेरे कानो में कर देगी ज़खम।
ऐसे घुस जाएगी मेरे जिस्म में कीलों की तरह, यूँ लगता है
के फिर से एक उमर लगेगी ठीक होने में।
अजब सा डर है घुला जाता है दिल में मेरे.....
ये रात घोल कर कही न मुझको पी जाए।
ये रात चूस कर न थूक दे कही मुझको॥
Friday, November 20, 2009
तुम क्या गए... जिंदगी को बहाना मिल गया बिगड़ने का.
दिल से निकली इस आवाज़ को ज़रा सुनिए....
तुम क्या गए...
जिंदगी को बहाना मिल गया बिगड़ने का।
कितनी तरतीब से रखा था,
सहेजा था तुमने मुझे।
जिंदगी फूल थी पहले तुम्हारे गजरे का।
जिंदगी फूल तो अब भी है,
पर एक गुलाब है सुखा हुआ।
पड़ी हुई है जो दबी यादों के पन्नो के बीच....
सूखी हुई, मुरझाई हुई।
तुम जो आ जाओ तो फिर खिल जाए....
बिगड़ गई है... कुछ सुधर जाए।
तुम क्या गए...
जिंदगी को बहाना मिल गया बिगड़ने का।
कितनी तरतीब से रखा था,
सहेजा था तुमने मुझे।
जिंदगी फूल थी पहले तुम्हारे गजरे का।
जिंदगी फूल तो अब भी है,
पर एक गुलाब है सुखा हुआ।
पड़ी हुई है जो दबी यादों के पन्नो के बीच....
सूखी हुई, मुरझाई हुई।
तुम जो आ जाओ तो फिर खिल जाए....
बिगड़ गई है... कुछ सुधर जाए।
Wednesday, November 18, 2009
मेरी हाइवे की यात्रा
अर्ज़ किया है...
कितनी फुर्ती से ख़तम होती हैं दूरियां,
जब सफर हाइवे का होता है।
ज़रा सी देर में दस बीस किलोमीटर तो
यूँ ख़तम होते हैं जैसे के हों टूटे पैसे।
और शहरों की भीडभाड़ में यूँ लगता है,
जैसे नुक्कड़ के पान वाले को दे दी हो एक हज़ार की नोट।
मेरी गाड़ी के पहिये ऐसे खीचते हैं सड़क,
जैसे स्ट्रा से कोई ड्रिंक खीच लेता है।
शाम का वक्त हो रफ़्तार और तन्हाई...
या खुदा क्या कमाल होता है....
ऐसे आलम मैं जब सफर हाइवे का होता है।
कितनी फुर्ती से ख़तम होती हैं दूरियां,
जब सफर हाइवे का होता है।
ज़रा सी देर में दस बीस किलोमीटर तो
यूँ ख़तम होते हैं जैसे के हों टूटे पैसे।
और शहरों की भीडभाड़ में यूँ लगता है,
जैसे नुक्कड़ के पान वाले को दे दी हो एक हज़ार की नोट।
मेरी गाड़ी के पहिये ऐसे खीचते हैं सड़क,
जैसे स्ट्रा से कोई ड्रिंक खीच लेता है।
शाम का वक्त हो रफ़्तार और तन्हाई...
या खुदा क्या कमाल होता है....
ऐसे आलम मैं जब सफर हाइवे का होता है।
Tuesday, November 17, 2009
एक नए परिंदे के नाम.....
कल एक अनजाने से जाने पहचाने दोस्त ने कुछ लिखने पर मजबूर कर दिया। पढ़ लीजिये...
एक अरमान भरा दिल कल फिर रोया था।
काजल फैल गया था उसका।
मुझसे कुछ कहते कहते खामोश हो गया।
लाया था कुछ सपनो की तस्वीर बना के,
दर्द निचोड़ के कागज़ पर एक नज़्म सजाके।
कहता था इस नज़्म पे मेरी कुछ तो बोलो।
क्या कहता मैं उस पल,
बस खामोश रह गया।
मुझको अपना माजी याद आया था, जब मैंने वो नज़्म सुनी थी।
कल मुझको गर मिला तो मैं बस यही कहूँगा...
यार तेरी उस नज़्म ने कुछ यूँ असर किया था,
तीन बजे चौथी सिगरेट के धुंए में भी,
बस दो ही चीज़ें दिखती थी मुझको।
माजी** से एक धुंधली सी प्यारी सी सूरत,
और तेरी उस नज़्म का मिसरा* जिसमे लिखा था
"आज किसी को यूँ ही कहने का दिल है वो क्या हैं...."
*= line
**= past.
एक अरमान भरा दिल कल फिर रोया था।
काजल फैल गया था उसका।
मुझसे कुछ कहते कहते खामोश हो गया।
लाया था कुछ सपनो की तस्वीर बना के,
दर्द निचोड़ के कागज़ पर एक नज़्म सजाके।
कहता था इस नज़्म पे मेरी कुछ तो बोलो।
क्या कहता मैं उस पल,
बस खामोश रह गया।
मुझको अपना माजी याद आया था, जब मैंने वो नज़्म सुनी थी।
कल मुझको गर मिला तो मैं बस यही कहूँगा...
यार तेरी उस नज़्म ने कुछ यूँ असर किया था,
तीन बजे चौथी सिगरेट के धुंए में भी,
बस दो ही चीज़ें दिखती थी मुझको।
माजी** से एक धुंधली सी प्यारी सी सूरत,
और तेरी उस नज़्म का मिसरा* जिसमे लिखा था
"आज किसी को यूँ ही कहने का दिल है वो क्या हैं...."
*= line
**= past.
Sunday, November 15, 2009
चाँद मर जाएगा धरती पर गिर के..
चाँद में सबको अपना प्यार दीखता है। किसी बच्चे को मामा दीखता है। कभी चाँद के ज़ख्मो को देखा है? आओ दिखाऊं चाँद के ज़ख्म..... एक और नज़्म पेश है.....
याद है। कैसे माँ बेहेला देती थी मुझको॥
कहकर देखो चाँद में एक बरगद के नीचे,
चरखा चला रही है बुढिया
जब भी देखनी चाही है मैंने वो बुढिया,
दिखी है मुझको।
चाँद भी हसकर, बिना कहे एक लफ्ज़ भी मुझसे
जिस्म के ज़ख्मो को बतलाकर बरगद बुढिया ,
काली ठंडी रातो में, बर्फाब हवा में
मेहेज़ मुझे बहला रखने की कोशिश में,
कैसे उनकी खूब नुमाइश करता था।
आह! हवा से ज़ख्मो में तकलीफ होती है..
आज समझ आता है मुझको।
ओस समझकर जिसपे रोज़ सवेरे नंगे पाँव चला करता था,
आंसू थे उसके,
आज समझ आता है मुझको।
जब मैं सो जाता था तब वो रोता था शायद,
ज़ख्मो में जब दर्द की फसलें पकती होंगी।
आज समझ आता है मुझको।
कैसी बेगरजी की थी वो चाँद की यारी!
अब भी वो बुढिया वैसी की वैसी है।
अब भी ओस पड़ी रहती है फूलों पर ।
अक्सर ये ही सोच के मैं बेकल रहता हूँ ,
यूँ ही बच्चों को बहलाते बहलाते
ज़ख्म अगर नासूर हो गए,
एक भी हाथ पहुँच न पाएगा पट्टी करने।
धाड़ से बस धरती पर गिर जाएगा मर के।
अनुराग राय।
याद है। कैसे माँ बेहेला देती थी मुझको॥
कहकर देखो चाँद में एक बरगद के नीचे,
चरखा चला रही है बुढिया
जब भी देखनी चाही है मैंने वो बुढिया,
दिखी है मुझको।
चाँद भी हसकर, बिना कहे एक लफ्ज़ भी मुझसे
जिस्म के ज़ख्मो को बतलाकर बरगद बुढिया ,
काली ठंडी रातो में, बर्फाब हवा में
मेहेज़ मुझे बहला रखने की कोशिश में,
कैसे उनकी खूब नुमाइश करता था।
आह! हवा से ज़ख्मो में तकलीफ होती है..
आज समझ आता है मुझको।
ओस समझकर जिसपे रोज़ सवेरे नंगे पाँव चला करता था,
आंसू थे उसके,
आज समझ आता है मुझको।
जब मैं सो जाता था तब वो रोता था शायद,
ज़ख्मो में जब दर्द की फसलें पकती होंगी।
आज समझ आता है मुझको।
कैसी बेगरजी की थी वो चाँद की यारी!
अब भी वो बुढिया वैसी की वैसी है।
अब भी ओस पड़ी रहती है फूलों पर ।
अक्सर ये ही सोच के मैं बेकल रहता हूँ ,
यूँ ही बच्चों को बहलाते बहलाते
ज़ख्म अगर नासूर हो गए,
एक भी हाथ पहुँच न पाएगा पट्टी करने।
धाड़ से बस धरती पर गिर जाएगा मर के।
अनुराग राय।
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