कल एक अनजाने से जाने पहचाने दोस्त ने कुछ लिखने पर मजबूर कर दिया। पढ़ लीजिये...
एक अरमान भरा दिल कल फिर रोया था।
काजल फैल गया था उसका।
मुझसे कुछ कहते कहते खामोश हो गया।
लाया था कुछ सपनो की तस्वीर बना के,
दर्द निचोड़ के कागज़ पर एक नज़्म सजाके।
कहता था इस नज़्म पे मेरी कुछ तो बोलो।
क्या कहता मैं उस पल,
बस खामोश रह गया।
मुझको अपना माजी याद आया था, जब मैंने वो नज़्म सुनी थी।
कल मुझको गर मिला तो मैं बस यही कहूँगा...
यार तेरी उस नज़्म ने कुछ यूँ असर किया था,
तीन बजे चौथी सिगरेट के धुंए में भी,
बस दो ही चीज़ें दिखती थी मुझको।
माजी** से एक धुंधली सी प्यारी सी सूरत,
और तेरी उस नज़्म का मिसरा* जिसमे लिखा था
"आज किसी को यूँ ही कहने का दिल है वो क्या हैं...."
*= line
**= past.
Tuesday, November 17, 2009
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