Sunday, November 15, 2009

चाँद मर जाएगा धरती पर गिर के..

चाँद में सबको अपना प्यार दीखता है। किसी बच्चे को मामा दीखता है। कभी चाँद के ज़ख्मो को देखा है? आओ दिखाऊं चाँद के ज़ख्म..... एक और नज़्म पेश है.....

याद है। कैसे माँ बेहेला देती थी मुझको॥
कहकर देखो चाँद में एक बरगद के नीचे,
चरखा चला रही है बुढिया
जब भी देखनी चाही है मैंने वो बुढिया,
दिखी है मुझको।
चाँद भी हसकर, बिना कहे एक लफ्ज़ भी मुझसे
जिस्म के ज़ख्मो को बतलाकर बरगद बुढिया ,
काली ठंडी रातो में, बर्फाब हवा में
मेहेज़ मुझे बहला रखने की कोशिश में,
कैसे उनकी खूब नुमाइश करता था।
आह! हवा से ज़ख्मो में तकलीफ होती है..
आज समझ आता है मुझको।
ओस समझकर जिसपे रोज़ सवेरे नंगे पाँव चला करता था,
आंसू थे उसके,
आज समझ आता है मुझको।
जब मैं सो जाता था तब वो रोता था शायद,
ज़ख्मो में जब दर्द की फसलें पकती होंगी।
आज समझ आता है मुझको।
कैसी बेगरजी की थी वो चाँद की यारी!

अब भी वो बुढिया वैसी की वैसी है।
अब भी ओस पड़ी रहती है फूलों पर ।
अक्सर ये ही सोच के मैं बेकल रहता हूँ ,
यूँ ही बच्चों को बहलाते बहलाते
ज़ख्म अगर नासूर हो गए,
एक भी हाथ पहुँच न पाएगा पट्टी करने।
धाड़ से बस धरती पर गिर जाएगा मर के।

अनुराग राय।

5 comments:

zindagi yuhi chalte rahe said...

chaand ke es zakham ko hamse achcha kaun samajh sakta hai.bahut hi kubsurat aur dard bhare nazm hai ye. this one is my fav.

Meraj Ahmad said...

स्वागत!
बहुत खूब
बधाई !
संभावनायें असीम हैं।

Shakeb Ahmad said...

yar maine kaha tha ki content achchha ho to bhi ye zaruri nhi hai k nazm bhi achchhi ho.......
































































































































par daro mat
nazm bhi achchhi hai......

Ranvijay Singh said...

yaar mujhe bahut achchi lagi. global warming ke dour me ye nazm bahut praasangik hai.

Anonymous said...

Kajal Agarwal